इंसान हो या पत्थर ?

सवाल ज्यादा मुश्किल नहीं और शायद आप के लिए जवाब भी ज्यादा मुश्किल ना हो...अरे भाई, इंसान है...हम भला पत्थर कैसे हो सकते है ...|
ज़रा एक बात तो बताओ कि इंसान और पत्थर में फर्क क्या हैं ?
ठीक कहा आपने....इंसान हिलता डुलता है लेकिन पत्थर नहीं.....
लेकिन अगर मै ये कहू कि लात मारने पर तो पत्थर भी हिलता है...
फिर इंसान और पत्थर में फर्क क्या है ?
फिर से ठीक कहा आपने..... इंसान खुद हिलता है लेकिन पत्थर को तो हिलाना पड़ता है |
फिर तो मै यक़ीनन कह सकता हु कि आप सब पत्थर ही है....|
पिछले लम्बे समय से मै और मेरे जैसे कितने लोग आप सभी को हिलाने का प्रयास कर रहे है....जगाने का प्रयास कर रहे है..... लेकिन आप है कि टस से मस नहीं हो रहे है......तो फिर आप इंसान कैसे हो सकते है.....इंसान तो खुद हिल सकता है....खुद संभल सकता है......खुद जाग सकता है.......|
अब फिर से विचार करो कि आप क्या हो....इंसान हो या पत्थर ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई वाह! मान गए, क्या भिगो के मारा है. एकदम सटीक ......लेकिन भैया मेरा हम फिर कहतें है, चोट ये हमी आपको लगेगी, वे तो बिलकुल वही हैं जैसा आपने कहा - "पत्थर". बचपन में विमल राय जी की एक कहानी पढ़ी ती -"ह्रदय के बिना", सच मानिये कई हपते तक दिल -दिमाग में गूंजती रही थी कहानी और दृश्य. मेरे बड़े पिताजी ने समझाया था तब बेटा यह कहानी है हकीकत नहीं. असर कम तो हो गया मिटा नहीं आज तक. अब मैं समझता हूँ हर कहानी एक हकीकत होती है केवल नाम, पात्र, क्षेत्र - परिक्षेत्र बदल जाते है. धन्यवाद ऐसी परभावशाली रचना प्रस्तुतीकरण के लिए

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  2. भाई वाह! मान गए, क्या भिगो के मारा है. एकदम सटीक ......लेकिन भैया मेरा हम फिर कहतें है, चोट ये हमी आपको लगेगी, वे तो बिलकुल वही हैं जैसा आपने कहा - "पत्थर". बचपन में विमल राय जी की एक कहानी पढ़ी ती -"ह्रदय के बिना", सच मानिये कई हपते तक दिल -दिमाग में गूंजती रही थी कहानी और दृश्य. मेरे बड़े पिताजी ने समझाया था तब बेटा यह कहानी है हकीकत नहीं. असर कम तो हो गया मिटा नहीं आज तक. अब मैं समझता हूँ हर कहानी एक हकीकत होती है केवल नाम, पात्र, क्षेत्र - परिक्षेत्र बदल जाते है. धन्यवाद ऐसी परभावशाली रचना प्रस्तुतीकरण के लिए

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