बीबी जी, आलू तो खत्म हो गए

हम जब भी बाज़ार में कुछ सामान खरीदने जाते है तो कही बार दुकानदार हमसे कह देता कि वो चीज खत्म हो गई है, हम भी उसे सरल भाव से ले आगे बढ़ जाते है .... ठीक इसी तरह एक दिन मै भी अपनी पत्नी के साथ बाज़ार गया, उसने दुकानदार से आलू मांगे तो दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा, बीबी जी आलू तो खत्म हो गए ....मेरी धर्म पत्नी ने कारण पूछा तो वो बोला, क्या बीबी जी , इसमें क्या है ... खत्म हो ही जाती है... उसकी फिक्र क्या करती हो... जो सब्जीया पड़ी है उनको देखो ना.... कितनी ताज़ा और बढ़िया है.......मेरी धर्म पत्नी दूसरी सब्जियों के बारे मै पूछने लगी .... लेकिन मेरा ध्यानं अभी भी दूकानदार कि उसी बात पर था कि "आलू खत्म हो गए" दुनिया कि हर चीज एक ना एक दिन खत्म होती ही है और हम सब उसे स्वाभाविक रूप से स्वीकार कर लेते है ....लेकिन जब भी कोई इंसान खत्म हो जाता है तो हम उसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते है ....गम उस वस्तु के खत्म होने का हो जो कभी खत्म होती ही ना हो तो मै समझ सकता हु लेकिन जो चीज बनी ही खत्म होने के लिए हो .... उसके खत्म होने का गम कैसा ?जैसा दुकानदार ने कहा... जो सब्जीया पड़ी है उनको देखो ......कितनी ताज़ा और बढ़िया है.... हम सब भी तो यही करते है.... कोई खत्म हो गया .....चार दिन आंशु बहाए और फिर लग गए आपने आपने काम काज में.....हम सभी उन आलूओ कि तरह ही है जो जब तक दुकान (दुनिया) में पड़े है सबकी नजरो में है और जैसे ही नजरो से गुल हुए यानि खत्म हुए .... लोग कहेंगे दूसरा देखो ... कितना ताज़ा और बढ़िया है

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