उड़ी उड़ी रे पतंग मेरी उड़ी रे....

पतंग का मौसम ....ऊपर पतंग और निचे उमंग....हर छत पर हल्ला हो....और सड़को पर भी पतंग लुटने वालो की भागम भाग....कितना मज़ा आता है ....लेकिन इन सब के बीच भी मेरा मन कुछ बेचैन था .... क्या चल रहा था इस मन में..?
मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक...जीवन मरण के बीच उलझा ये मेरा मन और क्या सोच सकता है...|
में सोच रहा था ....हाथ में मांजा थामे हर्सौल्लास से पतंग उड़ाते समय ..........क्या हमारे मन में एक बार भी ये आता है कि अभी कुछ ही पल में ये पतंग कट कर हमसे बहुत दूर .....बहुत दूर चली जाएगी....इतनी दूर कि वापस कभी लौट कर नहीं आएगी...|
शायद हम सब कुछ जानते है.....समझते है..... ये तो इस खेल का हिस्सा है.... भविष्य के डर से वर्तमान को खराब नहीं किया जा सकता....यही जीवन है...|
वर्तमान में जियो....जितना हो सके, मज़े कर लो....ये पतंग कभी भी कट सकती है....|
गगन में पतंग है
मन में उमंग है
हर कोई अपने परिवार के संग है
लेकिन मेरा मन आखिर
क्यों इतना दंग है
ये हमारा खेल है
लेकिन पतंगों की जंग है
एक पल आँखों में चमक
तो अगले ही पल आँखे नम है
फिर उठा ली नई पतंग
फिर भूल गए अपना गम है
जीवन क्या है सिखाने का...
शायद यही खुदा का ढंग है.
ये जीवन क्या है....एक पतंग है|

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस रचना पढकर ऐसा लगा कि कविता समय चक्र के तेज़ घूमते पहिए का चित्रण है। कविता की पंक्तियां बेहद सारगर्भित हैं।

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